1 भारत में 75 फीसदी कार्यबल कमजोर नौकरियों में है नियोजित...... - the opinion times

भारत में 75 फीसदी कार्यबल कमजोर नौकरियों में है नियोजित......

नई दिल्‍ली। बदलती अर्थव्‍यवस्‍था के दौर में भारत में कार्यबल की स्थिति बहुत अच्‍छी नहीं है। खासकर, ठेकेदारों के अंतर्गत काम करने वाले कार्यबल की स्थिति नियमित वेतनभोगी लोगों से बहुत अधिक खराब है। विश्‍व बैंक के अनुसार भारत में 75 फीसदी कार्यबल कमजोर नौकरियों में नियोजित है। कोविड महामारी से पहले से ही भारत की घेरलू स्थिति में गिरावट देखी जा रही थी, लेकिन कोविड महामारी की वजह से इसमें और गिरावट आई है, जिससे लोगों के सामने अधिक चुनौती है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ दशकों में, खपत वृद्धि आय वृद्धि से अधिक हो गई है। यह कम बचत और अधिक कर्ज का सीधा परिणाम है, जिससे लोगों की स्थिति और भी दयनीय होती जा रही है। रिपोटर्स के मुताबिक पूरे कार्यबल 437 मिलियन लोगों का लगभग 23% ही कार्यबल स्‍थायी वेतनभोगी है, शेष या तो स्व-नियोजित (लगभग 50%) या अस्थायी कर्मचारी (27%) हैं। विश्व बैंक के अनुसार भी, भारत में 75% से अधिक कार्यबल कमजोर नौकरियों में काम करता है।



जलवायु परिवर्तन भी बन रहा खतरा....
कार्यबल के कामकाज को प्रभावित करने में जलवायु परिवर्तन की भूमिका भी काफी अधिक है। केवल 10 प्रतिशत के आसपास लोग ही ऐसे हैं, जिनके पास बेहतर सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य, सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी ढांचा है। जानकारों के मुताबिक विकसित राष्‍ट्र वर्तमान में इसे और इसके प्रभावों को अधिक प्रभावी ढंग से संभालने में सक्षम हैं। विकासशील और अविकसित देशों पर इसके प्रभाव दुखद और विनाशकारी हैं। जानकार कहते हैं कि बारिश हो या अत्यधिक गर्मी कई चीजों को अस्त-व्यस्त कर देती हैं, जिसका कमजोर कार्यबल पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है, जिससे स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है और आय भी। कार्यबल बीमार होता है तो उसका काम छूट जाता है, जिससे उसका परिवार प्रभावित होता है। बच्‍चे स्‍कूलों से अनुपस्थित होते हैं तो उनका स्‍कूल छूट जाता है, ऐसा प्रभाव उन परिवारों को अधिक झेलना पड़ता है, जिनकी घर की माली हालत अच्‍छी नहीं होती है।

खाद्यान्नों की मात्रा और गुणवत्ता पर भी पड़ता है प्रभाव....
जलवायु परिवर्तन से न केवल लोगों के कामकाज पर असर पड़ता है, जबकि उत्पादन किए गए खाद्यान्नों की मात्रा और गुणवत्ता पर भी प्रभाव पड़ता है। कई अध्‍ययनों के परिणाम बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन की वजह से न केवल प्रति हेक्टेयर उत्पादन घट रहा है, बल्कि कई फसलों, विशेष रूप से चावल और गेहूं की गुणवत्ता में भी गिरावट देखने को मिल रही है। अनाज की आपूर्ति में कमी के परिणामस्वरूप गरीबों के सामने खाने का संकट है। वहीं, आपूर्ति की कमी से कीमतों में भी भारी उछाल देखने को मिल रहा है।

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